बुदचरित

बुदचरित महाकाव्य के बारे में

1. बुद्धचरित का परिचय क्या है ?
बुद्धचरित महाकवि अश्वघोष की कवित्व-कीर्ति का आधार स्तम्भ हैं, किन्तु दुर्भाग्यवश यह महाकाव्य मूल रूप में अपूर्ण ही उपलब्ध हैं।
28 सर्गों में विरचित इस महाकाव्य के द्वितीय से लेकर त्रयोदश सर्ग तक तथा प्रथम एवम् चतुर्दश सर्ग के कुछ अंश ही मिलते हैं।
इस महाकाव्य के शेष सर्ग संस्कृत में उपलब्ध नहीं हैं। इस महाकाव्य के पूरे 28 सर्गों का चीनी तथा तिब्बती अनुवाद अवश्य उपलब्ध हैं।


♥ बुद्धचरित लेख के मुख्य बिंदुओ... hindi budh god
1. बुद्धचरित का परिचय क्या है ?
2. बुद्धचरित की महत्वपूर्ण तथ्यों को जाने |
3. बुद्धचरित में कुल कितने सर्ग है ?
4. बुद्धचरित की कथावस्तु के बारे में जानकारियाँ |

महाकाव्य का आरम्भ बुद्ध के गर्भाधान से तथा बुद्धत्व-प्राप्ति में इसकी परिणति होती हैं।
यह महाकव्य भगवान बुद्ध के संघर्षमय सफल जीवन का ज्वलन्त, उज्ज्वल तथा मूर्त चित्रपट हैं।
इसका चीनी भाषा में अनुवाद पांचवीं शताब्दी के प्रारम्भ में धर्मरक्ष, धर्मक्षेत्र अथवा धर्माक्षर नामक किसी भारतीय विद्वान ने ही किया था |
तथा तिब्बती अनुवाद नवीं शताब्दी से पूर्ववर्ती नहीं हैं। इसकी कथा का रूप-विन्यास वाल्मीकि कृत रामायण से मिलता-जुलता हैं।

2. बुद्धचरित की महत्वपूर्ण तथ्यों को जाने |


बुद्धचरित महाकवि अश्वघोष की कवित्व-कीर्ति का आधार स्तम्भ हैं, किन्तु दुर्भाग्यवश यह महाकाव्य मूल रूप में अपूर्ण ही उपलब्ध हैं।
28 सर्गों में विरचित इस महाकाव्य के द्वितीय से लेकर त्रयोदश सर्ग तक तथा प्रथम एवम् चतुर्दश सर्ग के कुछ अंश ही मिलते हैं।
इस महाकाव्य के शेष सर्ग संस्कृत में उपलब्ध नहीं हैं। इस महाकाव्य के पूरे 28 सर्गों का चीनी तथा तिब्बती अनुवाद अवश्य उपलब्ध हैं।
महाकाव्य का आरम्भ बुद्ध के गर्भाधान से तथा बुद्धत्व-प्राप्ति में इसकी परिणति होती हैं।
यह महाकव्य भगवान बुद्ध के संघर्षमय सफल जीवन का ज्वलन्त, उज्ज्वल तथा मूर्त चित्रपट हैं।
इसका चीनी भाषा में अनुवाद पांचवीं शताब्दी के प्रारम्भ में धर्मरक्ष, धर्मक्षेत्र अथवा धर्माक्षर नामक किसी भारतीय विद्वान ने ही किया था |
तथा तिब्बती अनुवाद नवीं शताब्दी से पूर्ववर्ती नहीं हैं। इसकी कथा का रूप-विन्यास वाल्मीकि कृत रामायण से मिलता-जुलता हैं।
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3. बुद्धचरित में कुल कितने सर्ग है ?


☆ बुद्धचरित 28 सर्गों में था जिसमें 14 सर्गों तक बुद्ध के जन्म से बुद्धत्व-प्राप्ति तक का वर्णन हैं। यह अंश अश्वघोष कृत मूल संस्कृत सम्पूर्ण उपलब्ध हैं।
केवल प्रथम सर्ग के प्रारम्भ सात श्लोक और चतुर्दश सर्ग के बत्तीस से एक सौ बारह तक (81 श्लोक) मूल में नहीं मिलते हैं।
चौखम्बा संस्कृत सीरीज तथा चौखम्बा विद्याभवन की प्रेरणा से उन श्लोकों की रचना श्री रामचन्द्रदास ने की हैं। उन्हीं की प्रेरणा से इस अंश का अनुवाद भी किया गया हैं।

15 से 28 सर्गों की मूल संस्कृत प्रति भारत में बहुत दिनों से अनुपलब्ध हैं।
उसका अनुवाद तिब्बती भाषा में मिला था। उसके आधार पर किसी चीनी विद्वान ने चीनी भाषा में अनुवाद किया तथा आक्सफोर्ट विश्वविद्यालय से संस्कृत अध्यापक डाक्टर जॉन्सटन ने उसे अंग्रेजी में लिखा।
इसका अनुवाद श्रीसूर्यनारायण चौधरी ने हिन्दी में किया हैं, जिसको श्री रामचन्द्रदास ने संस्कृतपद्यमय काव्य में परिणत किया हैं।

☆ बुद्धचरित और सौन्दरनन्द महाकाव्य के अतिरिक्त अश्वघोष के दो रूपक-शारिपुत्रप्रकरण तथा राष्ट्रपाल उपलब्ध हैं।
इसके अतिरिक्त अश्वघोष की जातक की शैली पर लिखित ‘कल्पना मण्डितिका’ कथाओं का संग्रहग्रन्थ हैं।

4. बुद्धचरित की कथावस्तु के बारे में जानकारियाँ |


☆ बुद्धचरित की कथावस्तु गौतम बुद्ध के जन्म से लेकर निर्वाण-प्राप्ति तथा धर्मोपदेश देने तक परिव्याप्त हैं।
कपिलवस्तु जनपद के शाक्वंशीय राजा शुद्धोदन की पत्नी महारानी मायादेवी एक रात स्वप्न में एक गजराज को उनके शरीर में प्रविष्ट होते देखती हैं।
लुम्बिनीवन के पावन वातावरण में वह एक बालक को जन्म देती हैं। बालक भविष्यवाणी करता हैं- मैंने लोककल्याण तथा ज्ञानार्जन के लिये जन्म लिया हैं।
ब्राह्मण भी तत्कालीन शकुनों और शुभलक्षणों के आधार पर भविष्यवाणी करते हैं कि यह बालक भविष्य में ऋषि अथवा सम्राट होगा।
महर्षि असित भी राजा से स्पष्ट शब्दों में कहते हंव कि आपका पुत्र बोध के लिये जन्मा हैं। बालक को देखते ही राजा की आंखों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती हैं।
राजा अपने शोक का कारण बताता हैं कि जब यह बालक युवावस्था में धर्म-प्रवर्तन करेगा तब मैं नहीं रहूँगा। बालक का सर्वार्थसिद्ध नामकरण किया जाता हैं।
कुमार सर्वार्थसिद्ध की शैशवावस्था से ही सांसारिक विषयों की ओर आसक्त करने की चेष्टा की गई।
उन्हें राजप्रासाद के भीतर रखा जाने लगा तथा बाह्य-भ्रमण प्रतिषिद्ध कर दिया गया। उनका विवाह यशोधरा नामक सुन्दरी से किया गया, जिससे राहुल नामक पुत्र हुआ।

☆ समृद्ध राज्य के भोग-विलास, सुन्दरी पत्नी तथा नवजात पुत्र का मोह भी उन्हें सांसारिक पाश में आबद्ध नहीं कर सका। वे सबका परित्याग कर अन्तत: विहार-यात्रा के लिये बाहर निकल पड़े।
देवताओं के प्रयास से सर्वार्थसिद्ध सर्वप्रथम राजमार्ग पर एक वृद्ध पुरुष को देखते हैं तथा प्रत्येक मनुष्य की परिणति इसी दुर्गति में देखकर उनका चित्त उद्धिग्न हो उठता हैं।
वे बहुत दिनों तक वृद्धावस्था के विषय में ही विचार करते रहे। उद्यान भूमि में आनन्द की उपलब्धि को असम्भव समझकर वे पुन: चित्त की शान्ति के लिये बाहर निकल पड़ते हैं।
इस बार देवताओं के प्रयास से उन्हें एक रोगी दिखाई देता हैं। सारथि से उन्हें ज्ञात होता हैं कि सम्पूर्ण संसार में कोई भी रोग-मुक्त नहीं हैं।
रोग-शोक से सन्तप्त होने पर भी प्रसन्न मनुष्यों की अज्ञानता पर उन्हें आश्चर्य होता हैं और वे पुन: उद्विग्न होकर लौट आते हैं।
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