गणराज्य विषय की जानकारीयाँ

1. गणराज्य विषय की मुख्य जानकारियाँ क्या है ।


संविधान के अधीन सभी प्राधिकारों का स्त्रोत भारत के लोग हैं। भारत एक स्वाधीन राज्य है और अब वह किसी बाहरी प्राधिकारी के प्रति निष्ठावान नहीं है।
हमारे देश का राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति है।

♥ गणराज्य विषय लेख के मुख्य बिंदुओ...ganrajy gallery
1. गणराज्य विषय की मुख्य जानकारियाँ क्या है ।
2. आरक्षण और गणराज्य क्या है ?
3. ग्राम पंचायत क्या है ?
4. 'भारत का समाजवादी स्वरूप' क्या है ?

अब इस पद सहित किसी भी पद पर भारत के नागरिक की नियुक्ति होना संभव है।
इसकी व्याख्या को थोड़ा विस्तार दिया जाना चाहिए था। राष्ट्रपति को राजा के स्थान पर निर्वाचित प्राधिकारी माना जाता।
जिसका मुख्य कार्य ऋग्वेद (2/51/5) के अनुसार कुछ-कुछ ऐसा होता-
'हे राजन आप प्रकृष्ट बुद्घिवाले, छल-कपटयुक्त अयज्वा और अक्रती लोगों को (दस्युओं को) कम्पायमान कीजिए और जो यज्ञ न करके अपने पेट भरते हैं
उन दुष्टों को दूर कीजिए, और इन उपद्रव, अशांति, अज्ञानता और नास्तिकता फैलाने वाले जनों के नगरों को भग्न कर दीजिए।' पूरे संविधान को आप पलट लें।


2. आरक्षण और गणराज्य क्या है ?
'आरक्षण और गणराज्य' (Resevation and Republic)
गणराज्य में लोकतन्त्र की प्रथम सीढ़ी ग्राम को माना जाता है भारत में ऐसा ही किया गया है।
किन्तु आप देखेंगे कि भारत का राष्ट्रपति तो अप्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित है जबकि ग्राम का प्रधान (गणपति) सीधे जनता द्वारा चुना जाता है।
यह एक भयंकर विरोधाभास हमारे संविधान में है। हमें अपने देश का प्रधनमंत्री भी ग्राम प्रधान की तरह ही चुनना चाहिए।
प्रधनमंत्री के लिए सारा देश 'वोट' डाले। या फि र यह होना चाहिए कि ग्राम का गणपति (प्रधान) भी जनता के वोट द्वारा निर्वाचित ग्राम पंचायत सदस्यों में से ही चुना जाए।
यह बिल्कुल वैसे ही चुना जाये जैसे प्रधनमंत्री को हमारे सांसद चुनते हैं, अथवा मुख्यमंत्री को हमारे विधायक चुनते है।
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3. ग्राम पंचायत क्या है ?
ये ग्राम पंचायत सदस्य अपने द्वारा मतदान करके क्षेत्र पंचायत का सदस्य भेज सकते हैं। यह क्षेत्र पंचायत सदस्य गणपति कहा जा सकता है।
फि र ये गणपति मिलकर जिला पंचायत सदस्य का निर्वाचन करें जिसे क्षेत्रपति कहा जाये, और अंत में क्षेत्रपति अपने मध्य से एक जिला पंचायत के सभापति का निर्वाचन करें।
जिला पंचायतों के इन सभापतियों को भी राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में सम्मिलित किया जाये।
जिससे कि गणतन्त्र का सही स्वरूप मुखरित हो सके। यह होगा-गणराज्य का सही स्वरूप।
साथ ही आज की खर्चीली चुनाव प्रणाली पर होने वाले धन के अपव्यय और राजकोष पर पडऩे वाले अनावश्यक बोझ से भी बचा जा सकेगा।

3. 'भारत का समाजवादी स्वरूप' क्या है ?
भारत के संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' शब्द भी विशेष महत्व रखता है। समाजवाद की सीधी-सादी व्याख्या समाज के प्रत्येक वर्ग और व्यक्ति तक शासन की नीतियों का सही लाभ पहुँचाने से है। महल और झोंपड़ी के अन्तर को समाप्त करते-करते धीरे-धीरे पूर्णत: समाप्त करना इस व्यवस्था का उद्देश्य है। इस 'समाजवाद' शब्द की लोगों ने मनमानी व्याख्याएं की हैं। ये लोग समाजवाद की अपनी-अपनी व्याख्याओं के जंजाल में इस प्रकार उलझे कि समाजवाद की चादर को ही फाड़ बैठे। फलस्वरूप आज समाजवाद के चीथड़े उड़ गये हैं। जो समाजवाद हमें दीख रहा है वह समाजवाद नहीं है, अपितु समाजवाद की विकृतावस्था है। उसके चीथड़े हैं, टुकड़े हैं।
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