प्राचीन भारत के बारे में जानिये

प्राचीन भारत के इतिहास के संक्षिप्त लेख

मानव के उदय के होने से लेकर दसवीं सदी तक का भारत का इतिहास प्राचीन भारत का इतिहास कहलाता है।
और इसके बाद के भारत को मध्यकालीन भारत कहते हैं | जिसमें मुख्य रूप से मुस्लिम शासकों का अस्त्तिव रहा था।

♥ प्राचीन भारत लेख के मुख्य बिंदुओ...
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1. प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी प्राप्त करने के साधन |
2. पाषाण युग की जानकारियाँ |
3. पुरापाषाण युग युग की जानकारियाँ |
4. नवपाषाण युग की जानकारियाँ |
5. ताम्र पाषाण युग की जानकारियाँ |
6. कांस्य युग की जानकारियाँ |
7. महाजनपद् की कुल संख्या कितनी है ?

1. प्राचीन भारतीय की जानकारी प्राप्त करने के साधन निम्न स्त्रोतों से प्राप्त होते है.

2. पाषाण युग


पाषाण युग से मतलब एक ऐसे काल से है, जब लोग पत्थरों पर निर्भर थे। जैसे की पत्थर की गुफ़ा, पत्थर के औज़ार, ही उनके जीवन जीने के प्रमुख आधार थे।
और ये सभी मानव सभ्यता के आरम्भिक काल में से है, जब मानव आज की तरह विकसित नहीं हुआ था।
इसी काल में मानव प्राकृतिक आपादाओं से हमेशा जूझता रहता था, तथा शिकार या कन्द - मूल फल खाकर अपना जीवन यापन करता था।

3. पुरापाषाण युग युग की जानकारियाँ |


हिम काल का अधिकतर भाग पुरापाषाण काल में व्यतीत हुआ है। भारतीय पुरापाषाण युग को औजारों, जलवायु परिवर्तनों के आधार पर तीन भागों में विभाजित किया जाता है – वे इस प्रकार से है....
☆ आरंभिक या निम्न पुरापाषाण युग (25,00,000 ईस्वी पूर्व - 100,000 ई. पू.)

☆ मध्य पुरापाषाण युग (1,00,000 ई. पू. - 40,000 ई. पू.)

☆ उच्च पुरापाषाण युग (40,000 ई.पू -10,000 ई.पू.)


आदिम मानव के जीवाश्म भारत में नहीं प्राप्त हुये हैं। जैसा की महाराष्ट्र के बोरी नाम के स्थान पर मिले प्रमाणों से ऐसा प्रतीत होता है,
की मानव की उत्पत्ति लगभग 14 लाख वर्ष पूर्व हुआ होगा । हँलांकि यह भी बात लगभग सर्वमान्य है,
की अफ़्रीका की अपेक्षा भारत में मानव बाद में बसा है । फिर भी यहां के लोगों का पाषाण कौशल लगभग ठीक उसी तरह से विकसित हुआ होगा,
जिस प्रकार से अफ़्रीका में। और इस समय का मानव अपना भोजन बहुत ही कठिनाई से ही प्राप्त कर पाता था।
क्योंकि उस समय तक न तो वह खेती करने के लिये जानता था, और ना ही घर बनाने के लिये। यह हालत 9000 ई.पू. तक रही होगी।

आरंभिक या निम्न पुरापाषाण युग


पुरापाषाण काल के औजार की प्राप्ति छोटानागपुर के पठार से मिले हुये हैं जो 1,00,000 ई.पू. तक हो सकते हैं। आंध्र प्रदेश राज्य के कुर्नूल जिले में 20,000 ई.पू. से 10,000 ई.पू. के मध्य के औजार भी प्राप्त किये गये हैं।
इनके साथ अन्य प्रकार की प्रमाण जैसे की हड्डी के उपकरण तथा पशुओं के अवशेष भी प्राप्त हुये हैं।
तथा उत्तर प्रदेश राज्य के मिर्ज़ापुर जिले की बेलन घाटी में वहाँ से पशुओं के अवशेष प्राप्त किये गये हैं, जिससे की यह मालूम होता है,
की गाय, बकरी, भैंड़, भैंस इत्यादि पाले जाते थे। फिर भी पुरापाषाण युग की आदिम अवस्था का मानव शिकार और खाद्य संग्रह करने पर जीता था।
पुराणों में सिर्फ फल और कन्द मूल खाकर जीने वालों का उल्लेख है। लेकिन इस तरह के कुछ लोग तो आधुनिक काल तक गुफाओं और पर्वतों में रहते आये हैं।

4. नवपाषाण युग की जानकारियाँ |


भारत मे नवपाषाण युग के अवशेष सभवत: 6000 इसा पुर्व से लेकर 1000 इसा पुर्व के है,
विकास की यह अवधि भारतीय उप - महाद्वीप मे कुछ समय के बाद से आयी है, क्योंकि ऐसा माना जाता है,
की विश्व के बडे भु - भाग मे यह युग 7000 इसा पुर्व के आसपास शुरुआत हुयी होगी |
इस युग मे मानव पत्थर की बनी हाथ कि कुल्हाड़िया आदि औजार पत्थर को छिल और घीस तथा इसे धारधार चमकाकर तैयार करता था,
उत्तरी भारत मे नवपाषाण युग का स्थल बुर्जहोम जो की यह आज के क्षेत्र कशमीर मे पाया गया है | भारत में इस काल के प्रमुख चार स्थल है |

5. ताम्र पाषाण युग की जानकारियाँ |


नवपाषाण युग का अन्त होते होते ही धातुओं का प्रयोग करना शुरू हो गया था।
ताम्र पाषाणिक युग में प्रस्तर तथा तांबा के हथियार ही शामिल होते थे। और इस समय तक लोहा या कांसे का प्रयोग का शुरुआत नहीं हुआ था।
भारत में ताम्र पाषाण युग की बस्तियाँ पश्चिमी मध्य प्रदेश, दक्षिण पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण पूर्वी भारत में पायी गयी है।
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6. कांस्य युग की जानकारियाँ |


बीसवीं शताब्दी के शुरुआत तक इतिहासकारों की यह मान्यता रही थी |
की वैदिक सभ्यता भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता रही होगी। लेकिन सर दयाराम साहनी के नेतृत्व में 1921 में जब हड़प्पा जो की यह पंजाब राज्य के मान्टगोमरी जिले में स्थितहै,
जब वहाँ पर खुदाई हुई तब इस बात का पता चला की भारत की सबसे पुरानी सभ्यता वैदिक नहीं बल्की सिन्धु घाटी की सभ्यता है।
और ठीक अगले साल अर्थात 1922 में राखालदास बनर्जी के नेतृत्व में भी जब उनकी टीम ने मोहनजोदड़ो यानि की सिन्ध के लरकाना जिले में स्थित यह स्थान है,
उस स्थान की खुदाई हुई। तो हड़प्पा टीले के बारे में सबसे पहले चार्ल्स मैसन ने 1926 में वर्णन किया था।
मोहनजोदड़ो को मृतकों का टीला सिन्धी भाषा में कहा जाता है।
1922 में राखालदास बनर्जी ने और इसके बाद 1922 से1930 तक सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में यहां उत्खनन काम करवाया गया।

7. महाजनपद् की कुल संख्या कितनी है ?


बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय के आधार पर कुल सोलह महाजनपद थे, जो की इस प्रकार से है –
अवन्ति,अश्मक या अस्सक, गांधार, चेदि, वज्जि, अंग, कम्बोज, काशी, कुरु, कोशल, या वृजि, वत्स या वंश, पांचाल, मगध,मत्स्य या मच्छ, मल्ल, सुरसेन ।
इनमें सत्ता के लिये हमेशा आपस में संघर्ष चलता रहता था।

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