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गणित विषय की अन्य से जुड़ी हुई
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1. श्रीधराचार्य कौन थे ? तथा इनका गणित विषय में क्या योगदान है ?
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1. श्रीधराचार्य कौन थे ? तथा इनका गणित विषय में क्या योगदान है ?


दोस्तों श्रीधराचार्य प्राचीन भारत के एक महान गणितज्ञ थे। इन्होंने शून्य की व्याख्या किया और दिघात समीकरण को हल करने से सबंधीत सूत्र का प्रतिपादन किया।
इनके बारे में हमारी जानकारी बहुत ही कम होगी, या विल्कुल ही नहीं होगी, तथा इनके जन्म तिथि और जन्म स्थान के बारे में निश्चित रुप से कुछ नहीं कहा जा सकता है।
लेकिन ऐसा अनुमान लगाया जाता है, की.... 👍 उनका जीवनकाल 870 ई से 930 ई के बीच का था | वे वर्तमान के हुगली जिले में जन्म लिये थे | इनके माताजी का नाम अच्चोका औरा पिताजी का नाम बलदेवाचार्य था ।

श्रीधराचार्य की कृतियाँ तथा योगदान
इन्होंने 750 ई. के लगभग दो प्रसिद्ध पुस्तके, त्रिशतिका इसे 'पाटीगणितसार' भी कहा जाता हैं, पाटीगणित और गणितसार, दो पुस्तके लिखीं ।
इन्होंने बीजगणित के बहुत से महत्वपूर्ण आविष्कार किये | वर्गात्मक समीकरण को पूर्ण वर्ग बनाकर हल करने का इनके द्वारा आविष्कृत यह नियम आज भी 'श्रीधर नियम' या 'हिंदू नियम' के नाम से भी प्रचलित है ।
'पाटीगणित, पाटीगणित सार तथा त्रिशतिका उनकी उपलब्ध रचनायें हैं, जो मूलरूप से अंकगणित और क्षेत्र - व्यवहार से जुड़ा हुआ हैं ।

भास्कराचार् गणितज्ञ ने बीजगणित के अंत में - 👍 ब्रह्मगुप्त, श्रीधर और पद्मनाभ के बीजगणित को विस्तृत और व्यापक कहा है - :'ब्रह्म्नाय श्रीधरपद्मनाभबीजानि, यस्मादतिविस्तृतानि' ।

इससे मालूम होता है, की श्रीधर ने बीजगणित पर भी एक वृहद् ग्रन्थ की रचना किये थे, जो आज के समय में उपलब्ध नहीं है ।
भास्कर ने ही अपने बीजगणित में वर्ग समीकरणों के हल के लिये श्रीधर के नियम के सिदांतो को उद्धृत किया है |

चतुराहतवर्गसमै रुपैः पक्षद्वयं गुणयेत, अव्यक्तवर्गरुयैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम्‌ !

अन्य सभी भारतीय गणिताचार्यों की तुलना में श्रीधराचार्य द्वारा प्रस्तुत शून्य की व्याख्या सबसे ज्यादा स्पष्ट रूप से है। उन्होने लिखा है, की -
👍 यदि किसी संख्या में शून्य जोड़ा जाता है, तो योगफल उस संख्या के बराबर ही प्राप्त होता है,
👍 यदि किसी संख्या से शून्य घटाया जाता है, तो परिणाम उस संख्या के बराबर ही प्राप्त होता है |
👍 यदि किसी शून्य को किसी भी संख्या से गुणा किया जाता है, तो उसका गुणनफल बी शून्य ही प्राप्त होगा ।
👍 उन्होने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा है, की किसी संख्या में शून्य से भाग देने पर क्या होगा ।


किसी संख्या को भिन्न के द्वारा विभाजित करने के लिये उन्होने बताया है, की उस संख्या में उस भिन्न के व्युत्क्रम से गुणा कर देना चाहिये।
उन्होने बीजगणित के व्यावहारिक उपयोगों के बारे में भी लिखा है, और बीजगणित को अंकगणित से अलग किया।
वर्ग समीकरण का हल प्रस्तुत करने वाले प्रथम गणितज्ञों में श्रीधराचार्य का नाम अग्रणी है ।

वर्ग समीकरण हल करने की श्रीधराचार्य विधि
→ ax2 + bx + c = 0
→ 4a2x2 + 4abx + 4ac = 0 ; ( 4a से गुणा करने पर )
→ 4a2x2 + 4abx + 4ac + b2 = 0 + b2 ; (दोनों तरफ में b2 जोड़ने पर)
→ (4a2x2 + 4abx + b2 ) + 4ac = b2
→ (2ax + b)(2ax + b) + 4ac = b2
→ (2ax + b)2 = b2 - 4ac
→ (2ax + b)2 = (√D)2 ; ( D = b2-4ac )
अतः हमें x के दो मूल (रूट) निम्नलिखित रूप से प्राप्त होते हैं...
प्रथम मूल α = (-b - √(b2-4ac)) / 2a
दितीय मूल β = (-b + √(b2-4ac)) / 2a



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